नवीनतम लेख
हिंदू नववर्ष का आगमन हो रहा है और इसके साथ ही विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से पहचाने जाने वाले त्योहारों की शुरुआत हो जाती है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता है, जबकि पंजाब में बैसाखी, सिंध में चेटीचंड, दक्षिण भारत में युगादि, उगादि और पुथांडु, आंध्र में उगादिनाम, जम्मू-कश्मीर में नवरेह, केरल में विशु, असम में रोंगली बिहू के नाम से जाना जाता है।
इस वर्ष 30 मार्च 2025 को विक्रम संवत 2082 प्रारंभ होगा और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा 19 मार्च 2026 गुरुवार को समाप्त होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे गुड़ी पड़वा क्यों कहते हैं? घर के आगे गुड़ी बांधने का महत्व क्या है? ऐसे में आइए जानते हैं इस कथा के पीछे की कहानी और गुड़ी पड़वा के महत्व को।
मराठी समाज में गुड़ी पड़वा एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें लोग गुड़ी को बनाकर उसकी पूजा करके घर के द्वार पर ऊंचे स्थान पर स्थापित करते हैं। गुड़ी पड़वा दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसमें गुड़ी का अर्थ होता है विजय पताका और पड़वा का मतलब होता है प्रतिपदा। इस दिन का महत्व भगवान श्रीराम की विजय से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने बाली के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई थी। इसके बाद बाली के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (गुड़ी) फहराए थे। आज भी महाराष्ट्र में घर के आंगन में गुड़ी खड़ी करने की प्रथा प्रचलित है। यह गुड़ी विजय और समृद्धि का प्रतीक है और इसकी पूजा करने से घर में सुख और समृद्धि आती है।
मराठी समाज में गुड़ी पड़वा के दिन एक विशेष परंपरा का पालन किया जाता है। लोग गुड़ी को बनाकर उसकी पूजा करके घर के द्वार पर ऊंचे स्थान पर उसे स्थापित करते हैं। यह परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है, जब योद्धा युद्ध जीतकर घर वापस आते थे और घर के द्वार पर विजय पताका के रूप में ध्वज लगाते थे। इस पारंपरिक प्रथा के पीछे एक गहरा अर्थ है। यह विजय और समृद्धि का प्रतीक है और इसकी पूजा करने से घर में सुख और समृद्धि आती है। चैत्र प्रतिपदा के दिन नववर्ष और विजय उत्सव के रूप में यह प्रचलन चला आ रहा है, जो हमें अपने जीवन में विजय और समृद्धि की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
गुड़ी पड़वा के अनुष्ठान सूर्योदय से पहले आरंभ हो जाता है लोग प्रातः जल्दी उठकर शरीर पर तेल लगाने के बाद स्नान करते हैं। नित्यकर्म से निवृत्त होकर घर और द्वार की सुंदर सजावट की जाती है। घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण बनाकर लगाया जाता है और सुंदर फूलों से द्वार को सजाया जाता है। इसके साथ ही रंगोली बनाई जाती है।
इसके बाद गुड़ी की पूजा की जाती है। गुड़ी बनाने के लिए लकड़ी का एक दंड लिया जाता है जिसे साफ धोया जाता है और उसके ऊपर रेशमी कपड़ा या साड़ी बांधी जाती है। इसके बाद, नीम की टहनी, आम के पांच पत्ते, फूलों की माला, शक्कर की माला और तांबा पितल या चांदी का लोटा या गिलास लगाया जाता है।
गुड़ी की पूजा करने के लिए गुड़ी को अच्छी तरह से बांधकर और उस पर सुगंध, फूल और अगरबत्ती लगाकर दीपक से पूजा की जाती है। इसके बाद दूध-चीनी, पेड़े का प्रसाद अर्पित किया जाता है। दोपहर के समय, गुड़ी को मीठा प्रसाद अर्पित किया जाता है। इस दिन परंपरा के अनुसार, श्रीखंड-पुरी या पूरन पोली का भोग लगाया जाता है।
गुड़ी पड़वा के दिन कुछ विशेष व्यंजन भी बनाए जाते हैं। जैसे कि पूरन पोली, पुरी और श्रीखंड, खीर, मीठे चावल जिन्हें लोकप्रिय रूप से शक्कर भात कहा जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है, जिसमें गुड़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आम मिलाया जाता है। यह व्यंजन जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद का प्रतीक होता है।
'इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।