Mahatara Jayanti Katha: क्यों मनाई जाती है महातारा जयंती, जानिए इस पर्व से जुड़ी पौराणिक कथाएं
हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष स्थान है, जिनमें से एक देवी महातारा हैं। उन्हें शक्ति, ज्ञान और विनाश की देवी माना जाता है। देवी महातारा का स्वरूप गहरे नीले रंग का होता है, उनकी चार भुजाएं होती हैं और वे त्रिनेत्री हैं। उनके हाथों में खड्ग (तलवार), कपाल (खोपड़ी), और अन्य अलंकार होते हैं। महातारा जयंती विशेष रूप से उन साधकों के लिए महत्वपूर्ण है जो तंत्र विद्या, आध्यात्मिक उन्नति और आत्मज्ञान की खोज में लगे होते हैं। इस दिन देवी की कथा सुनने, मंत्र जाप करने और विशेष अनुष्ठान करने से भक्तों को सिद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
महातारा जयंती की पौराणिक कथा
महातारा देवी की कथा हिंदू धर्म और तांत्रिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। जब ब्रह्मांड में अज्ञान और अंधकार बढ़ गया था, तब आदिशक्ति ने महातारा के रूप में अवतार लिया। उनका मुख्य उद्देश्य ज्ञान का प्रकाश फैलाना और अधर्म को समाप्त करना था।
1. असुरों के आतंक से मुक्ति
पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई देवता नहीं मार सकता। इस वरदान के कारण वह अजेय बन गया और देवताओं को पराजित कर स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। परेशान देवताओं ने भगवान शिव और आदिशक्ति से सहायता की प्रार्थना की। आदिशक्ति ने तब महातारा का रूप धारण किया। उनका स्वरूप अत्यंत भयंकर था, जिससे असुर भयभीत हो गए। देवी महातारा ने अपने दिव्य अस्त्रों से असुरों का संहार किया और ब्रह्मांड में फिर से शांति स्थापित की।
2. भगवान शिव और महातारा का संवाद
एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान शिव ने संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा को आत्मसात कर लिया, तो संतुलन बिगड़ने लगा। आदिशक्ति ने महातारा के रूप में प्रकट होकर शिव को यह समझाया कि शक्ति का उपयोग सृष्टि की भलाई के लिए करना आवश्यक है। इस संवाद के बाद शिव ने अपनी ऊर्जा को नियंत्रित किया और संसार में संतुलन बहाल हुआ।
3. त्रिपुरा असुरों की कथा
त्रिपुरा नामक तीन असुर भाइयों ने अपनी शक्तियों के बल पर तीन लोकों पर अधिकार कर लिया। उन्होंने देवताओं को पराजित कर स्वर्गलोक तक में भय उत्पन्न कर दिया। देवताओं ने फिर से महातारा की शरण ली। देवी ने भगवान विष्णु और शिव के साथ मिलकर त्रिपुरा असुरों का विनाश किया और देवताओं को उनका साम्राज्य प्राप्त हुआ।
महातारा जयंती की पूजा विधि और महत्व
महातारा जयंती के दिन भक्त श्रद्धापूर्वक देवी की पूजा करते हैं। इस दिन भक्त निम्नलिखित विधि से पूजा करते हैं:
- मूर्ति या चित्र का पूजन: देवी महातारा की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उसे स्नान कराएं और चंदन, सिंदूर, पुष्प अर्पित करें।
- दीप जलाएं: घी का दीप जलाकर देवी की आरती करें।
- मंत्र जाप: इस दिन विशेष रूप से "ॐ ऐं ह्रीं स्त्रीं हूं फट् स्वाहा" मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।
- भोग अर्पित करें: देवी को फल, मिठाई, नारियल और पंचामृत अर्पित करें।
- साधना और तंत्र अनुष्ठान: जो साधक तंत्र साधना में रुचि रखते हैं, वे इस दिन विशेष अनुष्ठान कर सकते हैं।
महातारा जयंती क्यों मनाई जाती है?
देवी महातारा अज्ञान और अंधकार को समाप्त कर आत्मज्ञान प्रदान करती हैं। वे भक्तों को भय, संकट और शत्रुओं से रक्षा करती हैं। इस दिन की गई पूजा से आत्मबल, सफलता और सौभाग्य प्राप्त होता है। साधकों को तंत्र विद्या और सिद्धियों की प्राप्ति होती है। महातारा जयंती पर की गई साधना मोक्ष प्राप्ति का मार्ग खोलती है।